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भगवान मानकर इस मगरमच्छ की पूजा करते थे लोग, जब मरा तो अंतिम विदाई में रोया पूरा गांव

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New Delhi: छत्तीसगढ़ के एक गांव में हर कोई रो रहा था। वजह है- एक मगरमच्छ। गांव वालों के लिए ये कोई आम नहीं था, बल्कि बेहद खास था। जी हां- हम आपको बता रहे हैं मगरमच्छ गंगाराम की कहानी। छत्तीसगढ़ के लोग उस वक्त हैरान रह गए जब उन्होंने मगरमच्छ गंगाराम के मौ’त की खबर सुनी। लोगों के आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन जिस मगरमच्छ से आप डरते हैं, जो मगरमच्छ आपको जिंदा निगल सकता है, उसी मगरमच्छ की मौ’त पर गांव वाले आंसू बहा रहे हैं। जानते हैं क्यों? पढ़िए….

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छत्तीसगढ़ के मगरमच्छ ‘गंगाराम’ की खबर जानकर आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे। गंगाराम की मौ’त पर लोग गम में क्यों डूबे हुए हैं। आखिर इसकी मौ’त पर पूरे गांव में मातम क्यों छाया हुआ है। जिस गांव की हम बात कर रहे हैं वो गांव है रायपुर के पास बवामोहतरा । गांव वाले जब सुबह उठे तो अचानक उन्होंने देखा कि गंगाराम पानी के ऊपर आ गया। मछुआरे जब गंगाराम के करीब पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उसकी जान जा चुकी थी। इस खबर से पूरा गांव भावुक हो गया था। गंगाराम का श’व तालाब से बाहर निकाला गया। पूरे गांव में मुनादी करवाई गई। जिसके बाद अंतिम दर्शन के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव वालों ने ट्रक को सजा-धजाकर ट्रैक्टर पर उसकी अंतिम यात्रा निकाली। गंगाराम को श्रद्धांजलि देने के लिए पूरा गांव इकट्ठा हो गया। दूर-दूर से लोग गंगाराम के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।

गांव वालों का कहना है कि गंगाराम ने किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाया। वह बाकी मगरमच्छ से बहुत अलग था। तालाब में नहाते समय जब लोग मगरमच्छ से टकरा जाते थे तो वह खुद ही दूर हट जाता था। गंगाराम तालाब में मौजूद मछलियों को ही खाता था। मगरमच्छ गंगाराम को लोग घर से लाकर दाल चावल भी खिलाते थे और वह बड़े चाव से खाता था। गांववाले कहते हैं कि एक बार जरूर एक महिला पर गंगाराम ने ह’मला किया था लेकिन बाद में छोड़ दिया था। गंगाराम कभी-कभी तलाब के पार आकर बैठ जाता था। बारिश के दिनों में वह गांव की गलियों और खेतों तक पहुंच जाता था।

कई बार खुद गांव वालों ने उसे पकड़कर तालाब में डाला है। गंगाराम की उम्र 100 साल से ज्यादा थी। गांव वालों ने बताया कि गंगाराम की उम्र 125 साल थी। हालांकि वह इस तालाब में कब से था इस बात की जानकारी अभी किसी को नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक इस गांव में महंत ईश्वरीशरण देव यूपी से आए थे जो एक सिद्ध पुरूष थे। बताते हैं कि वही अपने साथ पालतू मगरमच्छ लेकर आए थे। उन्होंने गांव के तालाब में उसे छोड़ा था। साथ-साथ पहले कुछ और भी मगरमच्छ थे। लेकिन सिर्फ गंगाराम ही जीवित बचा। वे इस मगरमच्छ को गंगाराम कहकर पुकारते थे। उनके पुकारते ही मगरमच्छ तालाब के बाहर आ जाता था। गांव वाले इसे देव की तरह पूजते थे।

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