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यूथ आइकॉन बन चुके ‘ट्रिवागो ब्वॉय’ ने साझा की अपने संघर्ष की कहानी

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क्या आपने कभी ऑनलाइन होटल सर्च किया है? इसी सवाल के साथ टेलीविजन स्क्रीन पर, यूट्यूब पर नजर आनेवाले और देश में ट्रिवागो ब्वॉय के नाम से फेमस हो चुके अभिनव इन दिनों पर्सनल टूर पर भारत आए हुए हैं। वह बिहार के लखीसराय जिला के बड़हिया के रहनेवाले हैं।

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बिहार-झारखंड में स्कूली शिक्षा, फिर पूना होते हुए इटली में उच्च शिक्षा और फिर लीक से हटकर काम की तलाश में जर्मनी पहुंचे अभिनव ने अपनी काबिलियत साबित की, जिससे कि ऑनलाइन होटल सर्च कंपनी ट्रिवागो ने उन्हें भारत का कंट्री हेड बनाया। लखीसराय जिला प्रशासन ने उन्हें यूथ आइकॉन के लिए नामित किया है। यहां वह युवाओं को मतदान के प्रति जागरूक करेंगे।

हिन्दुस्तान संवाददाता निलेश कुमार के साथ बातचीत में उन्होंने अपने सफर और कई मुद्दों पर बातचीत की।

बिहार के एक छोटे से कस्बे से जर्मनी तक कैसे पहुंचे?
बड़हिया में कुछ दिन पढ़ा, फिर तीसरी से 10वीं तक की पढ़ाई रांची से की। ग्रेजुएशन तक कुछ क्लियर नहीं था कि क्या करना है! महाराष्ट्र के पूना स्थित मराठवाड़ा कॉलेज से बीकॉम कर लिया। वहीं, इंडो-इटालियन चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्कॉलरशिप के बारे में पता चला, जिसके सहारे इटली में इंटरनेशनल मैनेजमेंट में मास्टर्स का मौका मिला। 2011 में पढ़ाई पूरी की और दूरबीन के आविष्कारक गैलेलियो के शहर पाहवा(इटली) में एक दवा कंपनी में इंटर्नशिप करने लगा। इंडिया मार्केट रिसर्च कर रहा था, लेकिन कुछ नया करना था, सो इंटरनेट इंडस्ट्री में आया और दिसंबर 2012 से ट्रिवागो में लग गया।

कंट्री हेड बने, फिर विज्ञापन में एक्टिंग कैसे करने लगे ?
कंपनी हेड कई मॉडलों पर विज्ञापन ट्राइ कर रहे थे, कुछ विदेशी मॉडलों के साथ हिंदी में डबिंग करा कर चलाया, लेकिन संतुष्ट नहीं हुए। मुझसे कहा- तुम क्यों नहीं ट्राई करते। मैंने कभी कैमरा फेस नहीं किया था, फिर भी किया। कुछ साथियों ने इल्जाम भी लगाया कि मैं पद का फायदा उठा कर खुद को प्रोमोट कर रहा हूं, लेकिन ऐसा नहीं था। मैंने ट्रायल के तौर पर चलाया गया विज्ञापन कंटीन्यू होता चला गया।

आपका एड देखकर लोग इरिटेट भी हुए, आपपर मीम्स वायरल हुए?
हो सकता है, पतला-दुबला सा आदमी हूं। हमलोगों की आदत मोल-भाव करने की रही है। एड में भी मैं सीधे प्वाइंट पर बात करता हूं। सोशल मीडिया में मेरे मीम्स वायरल हुए, लेकिन सामने से कभी लोगों ने बुरा नहीं कहा। अब देश में घूमता हूं तो लोग साथ में फोटो खिंचवाना चाहते हैं, सेलिब्रेटी समझते हैं। हालांकि मैं जमीन से जुड़ा हुआ आम आदमी हूं। दूर से तस्वीर लेता देख पास बुलाता हूं और खिंचवाता हूं।

नौ साल से विदेश रह रहे हैं, कितना बदल गया है गांव-घर-देश?
पहले के मुताबिक बड़हिया काफी बदल चुका है। भारत के नक्शे में बड़हिया बहुत छोटा है, लेकिन उनसे पहले ही यहां के लोग बड़हिया को विश्वस्तरीय पहचान दिला चुके हैं। लोगों की सोच बदल रही है। बिहार और यहां के युवाओं से खास लगाव महसूस करता हूं। देसी खाना पसंद है, पर वहां मिलता नहीं। हां! डिजीटल इंडिया काफी आगे बढ़ चुका है।

युवाओं के लिए, बिहार के लिए आप क्या कुछ प्रयास कर रहे हैं?
पूना में एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन है-यूथ फॉर चेंज, जहां से वॉलियेंटरी करते हुए मुझे स्कॉलरशिप के बारे में पता चला था। वहां उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए नए-नए आइडिया के साथ युवाओं को आमंत्रित कर रहे हैं, जिन्हें फंड उपलब्ध कराया जाएगा। संगठन की सिल्वर जुबली पूरी हो रही है। इसके अलावे मुजफ्फरपुर में बेटियों को पढ़ाने के प्रोजेक्ट ज्योति के लिए भी बनी समिति में सहभागी हूं। केवल सरकार से शिकायत करने की बजाय हम युवा बदलाव लाने का हिस्सा बनें।

आज के युवाओं में संभावनाएं देखते हुए क्या संदेश देना चाहेंगे?
युवाओं को भी लीक से हटकर काम करने की सलाह देना चाहता हूं। युवा भीड़ का हिस्सा न बनें। आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर, रेलवे, बैंकिंग, उद्यमिता आदि में से युवा खुद में झांके और देखें कि उन्हें कहां संतुष्टि मिलती है। इसके अलावे भी सैकड़ों विकल्प मौजू हैं। युवा नॉलेज के पीछे भागें, पैसे के पीछे नहीं। आत्मसंतुष्टि रहेगी, तभी पैसे अच्छे लगेंगे।

Input : Live Hindustan

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