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-45 डिग्री,बर्फीले तूफान में अरुणिमा ने एक पैर से फतह की अंटार्कटिका की चोटी,शान से फहराया झंडा

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New Delhi: हौसले बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी आपके आगे हिम्मत हारकर घुटने टेक देती हैं। इस बात की मिसाल हैं पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की कहानी। अरुणिमा एक ट्रेन हादसे में अपना एक पैर खो चुकी हैं, लेकिन इसके बावदूज उन्होंने हार नहीं मानी और हमेशा आगे बढ़ती रहीं। अपना एक पैर गंवा चुकीं अरुणिमा ने हाल ही में अंटार्कटिका की सबसे ऊंची चोटी फतह करने का कीर्तिमान अपने नाम कर लिया।

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आपको जानकर हैरानी होगी कि अरुणिमा ने -40 से 45 डिग्री सेल्शियस में भी हिम्मत नहीं हारी और तेज बर्फीले तूफानों से लड़ते हुए ये कीर्तिमान रचा। बता दें कि इन्होंने ये मुकाम सिर्फ ऑक्सिजन के सहारे यह हासिल की है। अरुणिमा ने गुरुवार को 12 बजकर 27 मिनट पर अंटार्कटिका के सबसे ऊंची चोटी माउंट विंसन को फतह किया और तिरंगा झंडा भी फहराया।

अरुणिमा ने इस बात की जानकारी ट्वीटर के जरिए दी है। अरुणिमा सिन्हा को सफलता का नया शिखर छूने के लिए पीएम मोदी तक बधाई दे चुके हैं। पीएम मोदी ने कहा कि वह भारत की गौरव हैं, जिन्होंने अपने कठिन परिश्रम और दृढ़ता की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है। भविष्य में उनके प्रयासों के लिए मैं बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। पीएम मोदी का आभार व्यक्त करते हुए अरुणिमा ने कहा कि- जब देश के प्रधान सेवक इतने समर्पित हैं तो बतौर नागरिक हमें भी अपने-अपने क्षेत्रों में देश का नाम नई ऊंचाई पर ले जाने का सपना देखना चाहिए। भारतीय खिलाड़ियों की ओर से हम उनके लिए बनाई जाने वाली नीतियों और सम्मान के लिए आभार जताते हैं। जय हिंद।

अंटार्कटिका की जिस चोटी पर अरुणिमा पहुंची वहां पहुंचना बेहद कठिन है, ये कोई आसान काम नहीं हैं। वो भी एक पैर से। इन्होंने जो काम किया है वो वाकई बेमिसाल है। जिस चोटी तक अरुणिमा पहुंचीं हैं वहां जाना आसान नहीं है। सुनने में भी अविश्वसनीय लगने वाले इस कारनामे को अंजाम देने वाली वह दुनिया की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बन गई हैं।

अरुणिमा उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में जन्मीं हैं। वह वॉलीबाल प्लेयर भी हैं। वह सेना में जाना चाहती थी, लेकिन 2011 में दिल्ली जाते वक्त एक ट्रेन हादसे में उनके पैर कट गए और ख्वाब अधूरा ही रह गया। इसके बाद उनकी जिंदगी में मानों अंधेरा छा गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लंबे इलाज के बाद एक बार फिर से वह उठ खड़ी हुईं। उन्होंने पर्वतारोहण का सपना देखा और माउंटेनियरिंग स्कूल में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह किलिमंजारो (अफ्रीका), एल्ब्रुस (रूस), कास्टेन पिरामिड (इंडोनेशिया), किजाश्को जैसी चोटियां फतह कर चुकी हैं।

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