#ProudBihari: दुनिया को कैंसर से बचा रहा है यह बिहारी

वो कहते हैं न एक बिहारी, दुनिया पर भारी. तो राकेश पांडेय के साथ ये कहावत बिलकुल सटीक बैठती है. राकेश पांडेय आजकल लंदन में रहते हैं. दुनिया के कई देशों में राकेश के दफ्तर हैं. Bravo Pharma  ग्रुप के सीएमडी हैं. यह कंपनी कैंसर के इलाज के लिए अनुसंधान करती है, दवाएं बनाती हैं. पर, राकेश पांडेय बिहार की मिट्टी को अब भी नहीं भूले हैं. भूलना भी नहीं चाहते. कुछ करने की जिद भी है. राकेश पांडेय को याद है बचपन, जब उनके पास गांव से 35 किलोमीटर दूर मोतिहारी आने को पैसे नहीं होते थे. बस के भीतर बैठने का भाड़ा 5 रुपये लगता था और बस की छत पर बैठ सवारी करने को 3 रुपये देने होते थे. ऐसे में, राकेश पांडेय बस की छत पर बैठ ही मोतिहारी जाया करते थे.

आज राकेश पांडेय का इंटरव्‍यू अमेरिका – ब्रिटेन के बड़े अखबार प्रकाशित किया करते हैं. राकेश की धुन है – दुनिया के टॉप – 100 में शामिल होना. और उन्‍हें यकीन है कि जरुर शामिल होंगे. राकेश पांडेय का गांव मोतिहारी का सरोत्‍तर है. पर, आज मोतिहारी से बहुत दूर जाकर राकेश पांडेय का दफ्तर लंदन के अलावा उज्‍बेकिस्‍तान, स्‍वीडन, यूगांडा, रवांडा, दुबई, अमेरिका और एस्‍टोनिया जैसे देशों में भी है.

राकेश पांडेय के बारे में पड़ताल शुरु की तो मालूम हुआ कि उन्‍होंने मोतिहारी से स्‍कूलिंग की. परिवार ने गरीबी और संघर्ष को देखा है. 1992 – 1993 में राकेश ने मैट्रिक पास किया. फर्स्‍ट डिवीजन आया था, पर नंबर इतने नहीं थे कि पटना यूनिवर्सिटी के किसी कालेज में दाखिला हो जाता. मजबूरी में आरपीएस कालेज, नया टोला में एडमिशन लिया. पास में ही एक लॉज में रहने लगे.

लेकिन, धुन जिंदगी में कुछ करने की थी. लॉज में रहने के कारण कुछ दोस्‍त ऐसे बन गए, जो पटना साइंस कॉलेज में पढ़ते थे. उनके साथ जाकर चुपके से क्‍लास करने लगे. परिवार के जान – पहचान वाले एक प्रोफेसर साहब ने फ्री में ट्यूशन पढ़ा दिया. पटना में रहने में खर्च अधिक था. पिताजी कहा करते थे – सैलरी महीने में एक बार आती है, इसलिए पैसे भी महीने में एक बार ही मिलेगा.

खर्च को बराबर करने के लिए राकेश पांडेय ने पटना में अखबार बांटना शुरु कर दिया. वह ऐसे कि लॉज में अखबार देने वाले हॉकर के पास न्‍यूजपेपर बहुत हुआ करता था. सौदा यह पटा कि आधा अखबार हम पहुंचा देंगे. मुनाफा आधा हमें दे देना. राकेश पांडेय आज पटना के मौर्या होटल की बात क्‍या कहें, दुनिया के कई बड़े देशों के फाइव – सेवन स्‍टार होटल में रहते हैं. उनके मैनेजर और स्‍टाफ भी. लेकिन मौर्या होटल की याद उन्‍हें दूसरे तरीके से है.

तब वेडिंग सीजन में मौर्या होटल में कैटरिंग करने वाले लॉज के लड़कों को वेटर के रुप में बुला लाया करते थे. एक रात के डेढ़ सौ रुपये मिलते थे. राकेश पांडेय भी इसमें शामिल हो गए थे जेब खर्च निकालने को. लेकिन, एक रात फंस गए. जब वे वेटर के रुप में सर्विस कर रहे थे, तभी पार्टी में शामिल होने को रिश्‍ते के नाना जी आ गए, जोकि जज थे. अपने को छुपाने को राकेश तुरंत सर्विस मेज के नीचे छुप गए.

आगे राकेश पांडेय पढ़ने को दिल्‍ली गए. पटना में एक बैकलॉग लग चुका था. पिता को लग रहा था – बेटा डॉक्‍टर बनेगा. लेकिन दिल्‍ली में तो एडमिशन ही कॉरेस्‍पोंडेंस कोर्स में मिला. कुछ ट्यूशन वगैरह कर दिल्‍ली का खर्च निकाला. अब नौकरी की बारी थी.

राकेश को याद है कि पहली नौकरी एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में छह हजार रुपये  मिली. ट्रेनिंग को विदेश भेजा गया. पर तीसरे महीने ही मार्केटिंग हेड ने बुलाकर इस्‍तीफा देने को कहा. राकेश पांडेय अवाक् थे. वे इस्‍तीफा देने को तैयार नहीं थे, तब मार्केटिंग हेड ने समझाया. बोले – तुम एक कंपनी बनाओ. तुम्‍हें क्रेडिट फैसिलिटी समेत एक आर्डर देता हूं. यह आर्डर कोई पचास लाख रुपये का था. मतलब छह हजार से राकेश पांडेय की किस्‍मत ने सीघे पचास लाख की छलांग लगाई.

इसके बाद राकेश पांडेय ने कभी पीछे नहीं देखा है. आगे ही बढ़ते जा रहे हैं. कुछ दिनों तक कांट्रैक्‍टरी भी की. फिर, फार्मा बिजनेस में आ गए. तय किया कि कैंसर को हराने के लिए कुछ किया जाए. और तब से राकेश पांडेय की कंपनी लगातार बढ़ रही है. राकेश पांडेय मानते हैं कि भविष्‍य भारत का है. खासकर, चिकित्‍सा के क्षेत्र में. वे आस्‍ट्रेलिया के अपने एक मित्र का किस्‍सा सुनाते हैं. उन्‍हें दांत का इलाज कराना होता है. वे चालीस हजार रुपये की फलाइट का टिकट लेकर चेन्‍नई आते हैं और इलाज कराकर आस्‍ट्रेलिया लौट जाते हैं. आस्‍ट्रेलिया में इलाज की शुरुआत ही दो लाख रुपये से होगी.

राकेश पांडेय का फोकस जेनेरिक मेडिसिन पर भी है. कैंसर रोग से लड़ने के लिए दुनिया के कई देशों में एडवांस्‍ड डायग्‍नोस्टिक सेंटर की स्‍थापना कर रहे हैं. कैंसर से संबंधित एक रिसर्च सेंटर के टेकओवर का किस्‍सा राकेश पांडेय के साथ जबर्दस्‍त है. इस सेंटर को इंडिया के कई लोग भी लेना चाहते थे. इनमें दिल्‍ली के मशहूर बी एल कपूर भी थे. राकेश पांडेय का अनुभव कम ही था, पर जुनून अधिक था.

रिसर्च सेंटर के मालिक ने चयन किए गए संभावित खरीदारों को फाइनल इंटरव्‍यू के लिए बुलाया. सबों से बातचीत के क्रम में बोले – राकेश पांडेय तो बगैर किसी फ्यूचर प्‍लान के आ गए हैं. तब बिहारी राकेश पांडेय ने जवाब दिया – सर, आपका ऑफिस आपके घर से कितनी दूरी पर है. जवाब मिला – 15 किलोमीटर. आगे राकेश पांडेय ने कहा – ऑफिस के लिए घर से निकलने के पहले कुछ तो आज के लिए प्‍लान करते होंगे. तब उन्‍होंने कहा – हां, जरुर, पांच – सात मिनट तो सोच ही लेता हूं कि आज क्‍या करना है. अब राकेश पांडेय ने मास्‍टर स्‍ट्रोक खेला. बोले – मैं इंडिया से 5 हजार 400 किलोमीटर दूर आपके पास आया हूं, बगैर प्‍लान के तो नहीं आया हूं. लेकिन, सब कुछ पहले बता तो नहीं सकता. आखिर में, रिसर्च सेंटर राकेश पांडेय के नाम ही आया. टेकओवर के बाद पांडेय ने पुराने मालिक को मैनेजर के तौर पर अपने साथ रखा है.

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